प्रान वही जु रहैं रिझि वापर, रूप वही जिहिं वाहि रिझायो।
सीस वही जिहिं वे परसे पग, अंग वही जिहीं वा परसायो
दूध वही जु दुहायो वही सों, दही सु सही जु वहीं ढुरकायो।
और कहाँ लौं कहौं 'रसखान री भाव वही जू वही मन भायो॥
प्रान वही जु रहैं रिझि वापर, रूप वही जिहिं वाहि रिझायो।
सीस वही जिहिं वे परसे पग, अंग वही जिहीं वा परसायो
दूध वही जु दुहायो वही सों, दही सु सही जु वहीं ढुरकायो।
और कहाँ लौं कहौं 'रसखान री भाव वही जू वही मन भायो॥

Syed Ibrahim Khan (born 1548 A.D.) was a poet of Pashtun origins, who became a devotee of Lord Krishna. He is known to have lived in Amroha, India. Raskhan was his takhallus in Hindi. In his early years, he became a follower of Lord Krishna and learned the bh…
View profile & all 21 Poems / Storiesमानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।मोहिनि तानन सों रसखान, अटा चढ़ि गोधुन गैहै पै गैहै॥