फाँस लेती है दिल समझ लेंगे
ज़ुल्फ़ करती है बल समझ लेंगे
हम सिपाही हैं ओ कमान अबरू
तेग़ पकड़े अजल समझ लेंगे
निय्यत-ए-शब हराम ऐ साक़ी
आज तो सोएँ कल समझ लेंगे
आज बे-मिस्ल हो सुख़न में 'नसीम'
चार दिन में मसल समझ लेंगे
फाँस लेती है दिल समझ लेंगे
ज़ुल्फ़ करती है बल समझ लेंगे
हम सिपाही हैं ओ कमान अबरू
तेग़ पकड़े अजल समझ लेंगे
निय्यत-ए-शब हराम ऐ साक़ी
आज तो सोएँ कल समझ लेंगे
आज बे-मिस्ल हो सुख़न में 'नसीम'
चार दिन में मसल समझ लेंगे

उपनाम : 'नसीम' मूल नाम : पंडित दया शंकर कोल जन्म : लखनऊ, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश पंडित दया शंकर नसीम 1811 ई. में लखनऊ में पैदा हुए थे। उनका सम्बंध पंडितों के संभ्रांत और शिक्षित परिवार से था इसलिए उनको भी साहित्य से बेहद दिलचस्पी थी। ज़रूरी शिक्…
View profile & all 44 Poems / Storiesजब हो चुकी शराब तो मैं मस्त मर गयाशीशे के ख़ाली होते ही पैमाना भर गया
इश्क़ में दिल बन के दीवाना चलाआश्ना से हो के बेगाना चला
हम तुम हैं जो एक फिर जुदाई कैसीदिल ही न मिला तो आश्नाई कैसी
अश्क टपके हाल दिल का खुल गयादीदा-ए-गिर्यां से पर्दा खुल गया
नाम पर हर्फ़ न आने दीजेजान अगर जाए तो जाने दीजे