हम तुम हैं जो एक फिर जुदाई कैसी
दिल ही न मिला तो आश्नाई कैसी
काफ़िर न घमंड रख ख़ुद-आराई का
सब कुछ हों जो बुत तो फिर ख़ुदाई कैसी
निय्यत में तो है कि पाऊँ सहबा-ए-तहूर
ऐ शैख़ ये तेरी पारसाई कैसी
कहता था वो बद-ज़बान है मत छेड़ 'नसीम'
चपती तो न होगी क्यों सुनाई कैसी








