अनचाहा मैं

लीलाधर जगूड़ीलीलाधर जगूड़ी1 Sept 1940

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कोलईं की शाख हिली

खिड़की के पर्दे से झोंकों की बात चली!

धुप-धुप कर आँख मार लैंप, बुझा,

हर कोने, टेबल पर, कुर्सी पर

खुली हुई पुस्तक पर बैठ गया अंधकार!

माचिस नहीं मिल पाई

कमरे मैं फैल गया एक मात्र इंतज़ार

मनचाही नींद का

सपनों भरी मनचाही नींद का!

लीलाधर जगूड़ी
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लीलाधर जगूड़ी

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