रिश्तेदारों में जाते हुए पहनने होते गहने
खिले रंग के कपड़े
चूड़ियों से भरे हाथ
सिर पर पल्लू थोड़ा आगे तक खींचा हुआ
जातरुओं को फेरी देनी होती
और भैरू जी को चढ़ाना रहता चूरमा—
सवा किलो
मंगतों के लाचारी भरे चेहरे
चिटक-चिटक परसाद
धोबा भर चूरमे से भरे हाथ
तालाब की सीढ़ियों पर बैठा अनमना कुत्ता
मीठा खाकर अकुलाया हुआ
लंबे घूँघट में जात देने आई नई दुल्हन
दूसरी जाति में परणिजा हुआ पढ़ा-लिखा छोरा
मेला था यहाँ-वहाँ छितराया हुआ
एक खंडहर की साळ
थान पर ली गई हर फ़ोटो के बैकग्राउंड में
निर्लिप्त खड़ी रहती हर बार।








