दो मिनट का मौन

लता खत्रीलता खत्री

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दो मिनट का मौन

पहली बार कब रखा था

याद नहीं

शायद उस अँधेरी कोठरी में

जहाँ माँ ने जना मुझे

और बूढ़ी थकी दाई ने कहा माँ को

कि बच्चा जनते हुए

मुँह से आवाज़ मत निकालो

इससे पीड़ा बढ़ती है

मुँह भींचकर रखने से अदम्य शक्ति में बदल जाता है दर्द

फिर कहा—मुझ नवजात से—

दो मिनट चुप रहो

दुनिया में आई ही हो अभी और बाँय… बाँय…!

मगर जो पहला मौन याद है

वह स्कूल में रखवाया गया था

कौन मरा था

ओह! माफ़ करना

गुज़रा था

(किसी के जाने के बाद वह हो जाता है सम्माननीय)

हाँ तो कौन गुज़रा था यह तो याद नहीं

मगर उसके बाद समय-समय पर

धारण करती रही हूँ मौन

‘क्या होता है मौन होने से?’

पूछा था पिता से मैंने यह सवाल

जब पहली बार किया था

यह अजीब लगने वाला काम

‘मरने वाले के लिए प्रार्थना होती है मौन में!’

‘मैं हँसती हूँ मगर पिता, बाक़ी सब भी ऐसा करते हैं मन ही मन’

‘नहीं हँसोगी जब हो जाओगी बड़ी

जब समझने लग जाओगी चले जाने का अर्थ

जानोगी क्षति की क़ीमत!’

क्षतिपूर्ति संभव नहीं

दो मिनट के मौन की

जो बचपन में मुँह पर हाथ रखे हँसता था खीं खीं

उसको मरे हुए बहुत साल बीते

अभी-अभी जाना जब टटोल रही थी उसे किसी ज़रूरी काम से

मगर हाय कंकाल!

लता खत्री
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