कितने पश्चाताप
देर तक जागने के
और देर से उठने के
फिरती रहती हो फिर
अपराधी की तरह
हड़बड़ी में
काम निबटाकर
गर्दन झुकाए हुए
नज़र बचाकर
अपने किए को
मिटाती रहती हो
जन्म से गठरी उठाते हुए
मरने तक बोझ ढोती हो
कितने पश्चाताप ढोती हो
ओह! तुम अकेले
यात्रा करने के विचार मात्र से
अपराधबोध से भर जाती हो
मन ही मन खिल्ली उड़ाती हो
अपनी उस कल्पना की जिसमें
सेकंड क्लास की एक बोगी में बैठकर
तुम ‘बिनोदिनी’ को फिर से पढ़ रही हो
कितनी निश्चिंत!
क्योंकि
कुछ देर पहले
धड़धड़ाती हुई ट्रेन
जब एक पुल से गुज़री थी
तुमनें अपने छोटे से झोले से
एक बड़ी-सी गठरी को निकाल
पानी में धकेल दिया था
हौले से
सबकी नज़रें बचाकर।








