रस्सी का फंदा

लनचेनबा मीतैलनचेनबा मीतै

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फंदा

रस्सी का फंदा

एकता के अभाव का

आपसी बैर का

ईर्ष्या का

प्रतिशोध का

भारी और बड़ा रस्सी का फंदा :

डाल दिया हमारे गले में सामने आए बगैर ही

बन गए तभी से हम सब शव

लटके हैं कब से

भूत-प्रेतों के घर में बदले इस पुराने भवन की सरदल से

ज़िंदा हो चले गए कुछ शव दूर स्वर्ग-लोक

झटक फंदा स्वयं गले से चढ़कर पुष्प-रथ पर

रह गए फिर भी अनेक शव न हो सकने से ज़िंदा

सड़ते हुए लटक रहे इसी भवन की सरदल पर।

लनचेनबा मीतै
About the poet

लनचेनबा मीतै

मणिपुरी भाषा की ‘युवा कविता धारा’ के प्रतिनिधि कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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