हाई बीम सामने के काँच पर टकराकर आँखें चौंधियाती है
तक़रीबन दृष्टिहीन-सा चलाता हूँ गाड़ी
लौटते हुए देखता हूँ हिंदुस्तान जाग रहा है
मेरी पहली चिंता सुरक्षित घर पहुँचने की है
जागते हुए हिंदुस्तान को देखना
इंसान की बुनियाद से वाक़िफ़ होना है
रेंगता हुआ शहर जागता है
रेंगते हुए शहर के बाहर के इलाक़े बन रहे हैं शहरी इलाक़े
रेंग रहा है हिंदुस्तान एक लिजलिजे गिरगिट की तरह
घर लौटने तक सुबह का उजियारा आने को है
खिड़की खोलने पर दिखता है पिछवाड़े का छोटा-सा जंगल
जैसे ग़लती से बचा हुआ एक जीवन का कोना
ग़लती से बची हुई हवा
ग़लती से बचे हुए हैं कुछ पक्षी यहाँ
जाग रहा है पिछवाड़े में ग़लती से बचा हुआ
हिंदुस्तान।








