पढ़े-लिखे होने का मतलब

ललन चतुर्वेदीललन चतुर्वेदी

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जितने लोग बोल रहे हैं

उससे कहीं अधिक लोग चुप हैं

बोली और चुप्पी दोनों पढ़ी जाने वाली चीज़ें हैं

बशर्ते हमें पढ़ने आता हो

कुछ लोग कपड़े पहनने के बावजूद नग्न नज़र आते हैं

बोलना किसी को कटघरे में खड़ा कर सकता है

तो चुप्पी किसी को नंगा कर सकती है

ज़्यादातर लोग बिगाड़ के डर से

ईमान की बातें नहीं बोलते

खूँटे में बँधा आदमी जब तोते की तरह पाठ करता है

तो उसका ध्यान बोलने पर नहीं अपने पगार पर होता है

जब उसकी आत्मा उसे धिक्कारती है

तो लोर से भींग जाता है उसका तकिया

लेकिन सबेरा होते ही वह हैंगर में

एक बार फिर अपनी आत्मा टाँग

झकास कुर्ता पहनकर घंटों तक

तोताराम का चोला पहन बकवास करता है

हद तो तब होती है

जब स्वयं को गर्व से प्रतिबद्ध घोषित करने वाली क़लम

किसी भूखे के लिए एक शब्द नहीं लिखती

लेकिन सिर्फ़ एक पायदान आगे बढ़ने के लिए

किसी के प्रशस्ति-गान में ख़र्च कर देती है पूरी स्याही

शब्दों के साथ कोई पहली बार ऐसा खिलवाड़ नहीं हुआ है

हाँ, आवृत्ति बढ़ गई है इन दिनों

कोई फ़र्क़ नहीं रह गया प्रशंसा या निंदा में

जब कोई किसी की तारीफ़ के पुल बाँध रहा होता है

तो वह सजग श्रोता के कानों में पहुँचते ही

तब्दील हो जाती है निंदा में

सुधी पाठक समझ लेते हैं

इस प्रशंसा का निहितार्थ

अनपढ़ का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है

पर जो स्वयं को ख़ूब पढ़ा-लिखा मानते हैं

ललन चतुर्वेदी
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ललन चतुर्वेदी

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