बाघ

ललन चतुर्वेदीललन चतुर्वेदी

1 min read · 12.4K reads

ईश्वर के बारे में सोचते हुए

मैं बाघ के बारे में सोचने लगता हूँ

बाघ के बारे में सोचते हुए

मैं मनुष्यों के बारे में सोचने लगता हूँ

मनुष्यों के बारे में सोचते हुए

अचानक मेरी सोच बदल जाती है

तब सोचने लगता हूँ—

बाघ मनुष्यों से क्यों दूर रहते हैं।

ललन चतुर्वेदी
About the poet

ललन चतुर्वेदी

View profile & all 11 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

स्मृतिजैसे-जैसे उमर बढ़ती जाती है हमारे दिमाग़ में स्मृतियोंका ख़ज़ाना बनने लगता है। ख़ज़ाने में लगातार और-और— भगतसिंह सोनीजिस रास्ते गए वेबोली भिक्षुणी “—सुनों! एक दिन इसी रास्ते गए वहएक बालिका—वेश्या के उनके पैर पर माथा टेकते, उसे— बीरेंद्र चट्टोपाध्यायतुम्हेंलगता है पृथ्वी में समस्त दृश्य ही है पुनरावृत्तियों कामनुष्य रहेगा बैठा, घास पर उसका प्रेम— बिप्लव चौधुरीमेरा यह शब्दसमूह(तरुण कवियों के हाथ में)स्वप्न-वाटिका छूकर आते हुए मेरे इन शब्दों में जीवन-धारा की सुषमा— हीरेन भट्टाचार्यरेनर मरिया रिल्के कोतूने अपना एक-एक क्षण समर्पित किया इस जग कोजिसकी रगों के लहू में मृत्यु के अणु जीवित हैं।— हरिश्चंद्र भट्टभूखभूख पेट में नहींआँखों में है— हरि मृदुल