कुछ न कुछ बचा रहेगा

ललन चतुर्वेदीललन चतुर्वेदी

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गहन अंधकार में जब डूबी होगी धरती

किसी कोने में ज़रूर बचा रहेगा प्रकाश का एक क़तरा

वृक्ष के तने पर अंतिम साँस गिनता पीतवर्णी पत्ता

गिरते-गिरते आवाज़ दे रहा होगा वसंत को

जब शोकाकुल स्त्रियाँ रो रही होंगी किसी प्रिय की मौत पर

दूधमुँहे बच्चे पर पड़ते ही नज़र बंद हो चुकी होंगी उनकी रुलाई

और जैसा कि कुछ लोग सोचते हैं कि सब कुछ नष्ट हो जाएगा धीरे-धीरे

वैसा तो शायद आज तक कभी नहीं हुआ और नहीं होगा आगे भी

सब कुछ कभी नष्ट नहीं होता, कुछ न कुछ बचा रह जाता है

जैसे वृद्ध-कंठ में बचा रह जाता है बचपन का थोड़ा-सा संगीत।

ललन चतुर्वेदी
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ललन चतुर्वेदी

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