यह वृक्षों की सामूहिक हत्या का भी दौर है

लक्ष्मण गुप्तलक्ष्मण गुप्त3 Jan 1983

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एक

सिर्फ़
मनुष्यों की ही नहीं,
यह वृक्षों की भी 
सामूहिक हत्या का दौर है!

दो

इन दिनों मेरी चिंता में शामिल है
संसार भर के ताबूतों में 
लगी लकड़ियाँ
जिनकी चिकनाहट में
अनगिन वृक्षों की शाखाएँ
अपने करोड़ों घोंसलों के साथ
दफ़्न हो रही हैं 
मुस्कुराते हुए!

तीन

इन दिनों मेरी चिंता में शामिल हैं
वे वृक्ष भी
जिनकी शाखाएँ कभी एक साथ 
जल नहीं सकीं
अलग-थलग रहीं
एक अदने-से शरीर के वास्ते
श्मशान घाट पर
विलाप करते हुए!

लक्ष्मण गुप्त
About the poet

लक्ष्मण गुप्त

नई पीढ़ी के कवि-ग़ज़लकार। निम्नमध्यवर्गीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लक्ष्मण गुप्त जन्म : 03/01/1983 | पूर्वी चंपारण, बिहार

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