जब भी घर में
कहीं कुछ भी टूटने की
आती है आवाज़
हम समझ जाते हैं
इसमें शामिल होगी वह
वह जो मेरी नन्ही बेटी है
छन-सी आवाज़ के साथ ही आती है
उसकी मुस्कुराहट
जो उसके डर से
कहीं ज़्यादा चमकदार होती है
हमारे डाँटने से बेफ़िक्र वह
हमें यूँ देखती है, जैसे कह रही हो :
''आपकी बनी-बनाई यह दुनिया
जो कि बहुत बेढब है
मुझे हुबहू क़बूल नहीं
इसी तरह तोड़ते-तोड़ते
एक दिन मैं तोड़ दूँगी
दुनिया की सारी उठी हुईं दीवारें''
तोड़ना इतना सकारात्मक है
उस नन्हीं-सी लड़की के साथ रहते हुए
मैंने पहली बार जाना है!








