वह तोड़ना जानती है

लक्ष्मण गुप्तलक्ष्मण गुप्त3 Jan 1983

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जब भी घर में

कहीं कुछ भी टूटने की

आती है आवाज़

हम समझ जाते हैं

इसमें शामिल होगी वह

वह जो मेरी नन्ही बेटी है

छन-सी आवाज़ के साथ ही आती है

उसकी मुस्कुराहट

जो उसके डर से

कहीं ज़्यादा चमकदार होती है

हमारे डाँटने से बेफ़िक्र वह

हमें यूँ देखती है, जैसे कह रही हो :

''आपकी बनी-बनाई यह दुनिया

जो कि बहुत बेढब है

मुझे हुबहू क़बूल नहीं

इसी तरह तोड़ते-तोड़ते

एक दिन मैं तोड़ दूँगी

दुनिया की सारी उठी हुईं दीवारें''

तोड़ना इतना सकारात्मक है

उस नन्हीं-सी लड़की के साथ रहते हुए

मैंने पहली बार जाना है!

लक्ष्मण गुप्त
About the poet

लक्ष्मण गुप्त

नई पीढ़ी के कवि-ग़ज़लकार। निम्नमध्यवर्गीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लक्ष्मण गुप्त जन्म : 03/01/1983 | पूर्वी चंपारण, बिहार

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