रणथंभोर

हेमंत शेषहेमंत शेष28 Sept 1952

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डूबते काँपते अँधेरे में हमेशा मिल जाता है दूर किसी लालटेन का पेड़

क़िले में उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं हम जीवन के ढलान से उतरने के लिए

हमेशा के लिए मूर्तिशिल्प हो जाते हैं पेड़ों से रचे दृश्य

तालाब लिख रहा है कुछ शब्द भीतर हरे, अनपढ़े

जैसे काँटों और करवटों में उलझा हुआ हो आकाश

आधा चंद्र

पीलियाग्रस्त हवा में मील के पत्थर भूलती तितलियाँ

अंधकार की गोद में लेटा ऊँघता है गणेश मंदिर

दूर से आती है बाघ की हुंकार

पानी पर उतरा शाम का रंग और हताशा...

पहाड़ों ने खा लिए हैं चिड़ियों के बिंब और वे थक कर सो रहे हैं

औरतें दहाड़ों के बीच थाप रही हैं उपले

फूँक रही हैं चूल्हे

और आदमी बीड़ी पीते हुए अभयारण्य में मवेशी चरा रहे हैं

समय की बुहारी से

बुहारा जा चुका है नौ सौ साल का समय

अँधेरे के पानी में किसी मछली जैसा डूब गया है

ढहता हुआ क़िला रणथंभोर...

आओ, रज़िया सुलतान!

बार फिर आओ-

अब तुम्हारे लिए पुराने लोहे का यह विशाल फाटक हर वक़्त खुला है।

हेमंत शेष
About the poet

हेमंत शेष

सुपरिचित हिंदी कवि, कला-आलोचक, शौक़िया छायाकार, संपादक और चित्रकार। जन्म : 28/12/1952 | जयपुर, राजस्थान हेमंत शेष का जन्म 25 दिसम्बर 1952 को जयपुर, राजस्थान में एक संपन्न और शिक्षित परिवार में हुआ। पिता पेशे से वकील थे और कविताएँ लिखते थे। कविता-लेखन की प्रेरण…

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