परछाईं

हेमंत शेषहेमंत शेष28 Sept 1952

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कल की परछाईं

गिरती है

आज की देह पर

ज़रूरतें रोज़ झरती हैं पहने हुए कपड़ों पर

काठ की नसैनी के नीचे एक पुराना पीला पत्ता

उड़ता है मृत्यु को सरल बनाते हुए

मकान नदी के शीशे में झाँकते हैं

और दूरियाँ बीच में रख कर रेलगाड़ियाँ गुज़रती रहती हैं

बस, कभी-कभी मेरी कविता में गिरते हैं

विराम-चिह्नाें के पत्थर!

हेमंत शेष
About the poet

हेमंत शेष

सुपरिचित हिंदी कवि, कला-आलोचक, शौक़िया छायाकार, संपादक और चित्रकार। जन्म : 28/12/1952 | जयपुर, राजस्थान हेमंत शेष का जन्म 25 दिसम्बर 1952 को जयपुर, राजस्थान में एक संपन्न और शिक्षित परिवार में हुआ। पिता पेशे से वकील थे और कविताएँ लिखते थे। कविता-लेखन की प्रेरण…

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