साज के झरे हुए पत्तों से भरा जंगल
जैसे छायाओं ने अपनी केंचुली उतार दी है
झींगुरों का स्वर टहनियों का पार्श्व गायन है
पत्तों का ढेर
पुल और सुरंग दोनों ही
गिरगिटों के बच्चे गुज़रते हैं
घंटियों की पगडंडी प्रकट होती हैं
उस पर से चली आ रही बकरियाँ
पत्तों के क़ब्रिस्तान से चुपचाप गुज़र जाती हैं
घंटियाँ हर पत्ते की साँस टटोलती हुई
घाटी में उतर रही हैं








