मई में पचमढ़ी

हेमंत देवलेकरहेमंत देवलेकर

1 min read · 12.4K reads

साज के झरे हुए पत्तों से भरा जंगल

जैसे छायाओं ने अपनी केंचुली उतार दी है

झींगुरों का स्वर टहनियों का पार्श्व गायन है

पत्तों का ढेर

पुल और सुरंग दोनों ही

गिरगिटों के बच्चे गुज़रते हैं

घंटियों की पगडंडी प्रकट होती हैं

उस पर से चली आ रही बकरियाँ

पत्तों के क़ब्रिस्तान से चुपचाप गुज़र जाती हैं

घंटियाँ हर पत्ते की साँस टटोलती हुई

घाटी में उतर रही हैं

हेमंत देवलेकर
About the poet

हेमंत देवलेकर

इस सदी में सामने आए हिंदी कवि। रंगमंच से भी संबद्ध।

View profile & all 24 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like