मछलीघर

हेमंत देवलेकरहेमंत देवलेकर

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एक

कलर बॉक्स से ऊबकर
भागे हुए रंग
चित्रकार की
मर्ज़ी पूछे बिना
ख़ुद ही फैल जाना चाहते हैं
पानी के कैनवास पर

लहरों के 
सजे-सँवरे सुंदर चेहरे,
उनकी थिरकती देह 
और उनके लोकगीत
बन गए हैं रंग
जो अब कलर बॉक्स में
ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलने वाले

दो

उड़ती हुई पतंगों के
प्रतिबिंब थे
पानी की सतह पर तैरते हुए
जो अपनी-अपनी
डोर तुड़ाकर
गोते लगा गए हैं
पानी में गहरे
और भाग रहे हैं छूने
रोम-रोम पानी का

तीन

प्यार,
मस्ती
और झूमा-झटकी मची हुई है
नाच रहा है
सारा फागुन
ढोल पर बजती
रजवाड़ी पर
पानी ही दौड़ा जा रहा है
पानी को रंग लगाने
और पानी की ही
गलियों में
बेतहाशा
मची हुई है रंगपंचमी

हेमंत देवलेकर
About the poet

हेमंत देवलेकर

इस सदी में सामने आए हिंदी कवि। रंगमंच से भी संबद्ध।

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