बैठक का कमरा

हरीशचंद्र पांडेहरीशचंद्र पांडे28 Sept 1952

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चली आ रही है गर्म-गर्म चाय भीतर से

लज़ीज़ खाना चला आ रहा भाप उठाता

धुल के चली आ रही हैं चादरें-परदे

पेंटिग पूरी होकर चली आ रही है

सँवर के आ रही है लड़की

जा रहे हैं भीतर जूठे प्याले और बर्तन

गंदी चादरें जा रही हैं परदे जा रहे हैं

मुँह लटकाए लड़की जा रही है

पढ़ लिया गया अख़बार भी

खिला हुआ है कमल-सा बाहर का कमरा

अपने भीतर के कमरों की क़ीमत पर ही खिलता है कोई

बैठक का कमरा

साफ़-सुथरा संभ्रांत

जिसे हँसने की तमीज़ नहीं वह भी जाए भीतर

जो आए बाहर आँसू पोंछ के आए

हँसी दबा के

अदब से

जिसे छींकना है वहीं जाए भीतर

खाँसी वहीं ज़ुकाम वहीं

हँसी-ठट्ठा मारपीट सब वहीं

वहीं जलेगा भात

बूढ़ी चारपाई के पायों को पकड़ कर वहीं रोएगा पूरा घर

वहीं से आएगी गगनभेदी किलकारी और सठोरों की ख़ूशबू

अभ-अभी ये आया गेहूँ का बोरा भी सीधे जाएगा भीतर

स्कूल से लौटा ये लड़का भी भीतर ही जा कर आसमान

सिर पर उठाएगा

निष्प्राण मुस्कुराहट लिए अपनी जगह बैठा रहेगा

बाहर का कमरा

जो भी जाएगा घर से बाहर कभी, कहीं

भीतर का कमरा साथ-साथ जाएगा

हरीशचंद्र पांडे
About the poet

हरीशचंद्र पांडे

नवें दशक में सामने आए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि। अपने काव्य-विषयों, धैर्य और सादगी के लिए उल्लेखनीय मूल नाम : हरीशचंद्र पांडे जन्म : अल्मोड़ा, उत्तराखंड हरीशचंद्र पांडे का जन्म उत्तराखंड से अल्मोड़ा में 28 दिसंबर 1952 को हुआ। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से स्कूली शिक…

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