झंडा

हरेकृष्ण डेकाहरेकृष्ण डेका

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हमारे शहर के मैदान में

उत्सव की बहार है।

उन्नत सर ऊपर झंडे को देखते हैं।

देखो, वे सब एक साथ गा रहे हैं।

ओ अनजान देश के लोगो

किसका गान गा रहे हो तुम लोग?

यौवन का? जीवन का?

कोई उत्तर नहीं देता।

जय-जयकार कर वे सभी चले जाते हैं।

भिखारी जगकर

गुस्से में अंट-शंट बकता है,

ओः वे जानवर मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ गए।

उसका मरियल कुत्ता

और वह

जब नाली की जूठन पर एक साथ लपकते हैं

तब आसमान में उड़ रहे गिद्ध भी

उसी समय एक साथ नीचे उतरते हैं।

अस्तगामी सूर्य की ओर ताकता

झंडा अकेला लहराता रहता है।

हरेकृष्ण डेका
About the poet

हरेकृष्ण डेका

सुप्रसिद्ध असमिया कवि-कथाकार-समालोचक और अनुवादक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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