ख़ून देख डर मत जाना।
बलि के मांस का है यह
तुम्हारा हिस्सा, लो
पकाओ ख़ुद खाओ
बच्चों को खिलाओ
जाओ!
परंपरा भोगने का
यह भी है एक उपाय :
मैं कितना निर्भय
देखा!
कल रात
सपनों से हाथापाई में
शायद ख़ून का
एक क़तरा
छू गया है
हरसिंगार के गालों को।
ख़ून देख डर मत जाना।
बलि के मांस का है यह
तुम्हारा हिस्सा, लो
पकाओ ख़ुद खाओ
बच्चों को खिलाओ
जाओ!
परंपरा भोगने का
यह भी है एक उपाय :
मैं कितना निर्भय
देखा!
कल रात
सपनों से हाथापाई में
शायद ख़ून का
एक क़तरा
छू गया है
हरसिंगार के गालों को।

ओड़िया भाषा के सुपरिचित कवि-निबंधकार-स्तंभकार। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।
View profile & all 14 Poems / Stories(शुरूआत होगी एक गुहार से)हे प्रभु, हे विश्व नियन्ता, हे विधाता
हम कविता का विरोध सिर्फ़कर सकते हैं कविता में,
तुम तो जानते हो मेरी अयोग्यताकहीं कुछ मिल भी गया हो तो
पानी की चमड़ी तलेकुईं की उँगलियों में
सोचने का वक़्त है कहाँकुछ कहना ही होगा