ओ मेरे देश क्या तुझे पता है

हरप्रसाद दासहरप्रसाद दास

1 min read · 12.4K reads

ओ मेरे देश क्या तुझे पता है

आया मैं यहाँ किस गाँव से?

पता है तुझे?

पाले में झुलसे आम के बौर

बलुआ पत्थर की चौपाल पर

सोया पड़ा था मेरा बचपन

बन कर लकीर एक

पाटी की खड़िया बन

चिरंतन के गर्भ से

निकल रही थी कोई भोर

रंग मल कर चेहरे पर,

खाने को कुछ न था घर पर

तेल न था लालटेन में

न था नमक

न सरसों थी

न साग था न मिरच थी

न निमिष था

समय की ख़ाली आँख में।

नन्हा-सा लड़का निकल पड़ा था

नदी लाँघ, जाएगा बिदेस

और सहज ही वहाँ

निकल आएगी चिलिका

जंगल के भीतर से

दूर दिख रहा होगा द्वीप एक

पास दीपालोक में दिखते

युगों पुराने संदूक-सा।

एक पहाड़ पर से उतरते हुए

अंत में बुझ जाएगा उजाला

गेरुआ पंख एक छोड़

परकाल को चला जाएगा

पक्षी का संदेश

—विष है, विष

पानी में।

हरप्रसाद दास
About the poet

हरप्रसाद दास

ओड़िया भाषा के सुपरिचित कवि-निबंधकार-स्तंभकार। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 14 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like