जंगल में झील जागती

हरभजन सिंहहरभजन सिंह

1 min read · 12.4K reads

जंगल में झील जागती है

दिन हो रात हो

सोने का समय नहीं

एक जगह पड़ी हुई

संशय का सहम का

रास्ता रहे नापती

देह के दरवाज़े पर बार-बार दस्तक

आया कौन गया

मेरी पीठ सहलाकर

देह में उछलते लहू का शोर

पानी में झुनझुनी पवन की

हरी-हरी घास से रगड़ती

आवाज़ किसी नन्हे से नाग की

सो जाना घर से परदेस चले जाना

कौन हिफ़ाज़त करेगा

अनछुए खज़ाने की

पानी अनपिए की

अभी-अभी कुरता ओढ़नी खूँटी पर टाँगा

सूखने को रखा एकदम कोरा अनरंगा

सपना इन पर कोई हर्फ़ न लिख दे

सुच्ची को फ़्रिक़ दाग़ की

अंबर के बादल उसके पानी में तिरते

पंछी भी फासले

उसके पानी में तय करते

पवन में नन्हा-सा पत्ता भी बोले

उसके भी स्पर्श से फ़र्श इसका डोले

सीढ़ी-दर-सीढ़ी रोज़ उतरती जाएँ शूलें

चिंता हमेशा इसे

अपनी ज़मीन में औरों के बाग़ की

सदियों के पतझड़ में बिछे पीले पत्ते

उनमें दबे पाँव चलता कोई जानवर

लगता है चोरी-चोरी इधर बढ़े आता है

कर देगा पानी जूठा

गुज़र भी गया अगर पास से

जंगल में झील जागती है।

हरभजन सिंह
About the poet

हरभजन सिंह

पंजाबी के सुप्रतिष्ठित कवि, आलोचक, अनुवादक और संस्कृति-समीक्षक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 18 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like