आग

हरभजन सिंहहरभजन सिंह

1 min read · 12.4K reads

आधी-आधी रात

मुझे अम्मा ने झिंझोड़ जगाया

कहने लगी तेरे घर को किसी ने जलाया

फाँद कर दहलीज़ें आग भीतर

आन खड़ी हुई है

दीवारों छतों को चाट रही है

आग फाँद कर मैं बाहर निकला

नंगी ललकार की तरह

बाहर गली में बरसती थी गोलियाँ

बौछार के बीच

सहम गई मेरी ललकार

आग फाँद कर मैं फिर भीतर चला आया

अपने बच्चे को लगाकर गले, मींची आँखें

मन में आया

सारी उम्र बिताई

चिंता-चिंगारियों में

मरण समय तो निश्चित लेट लूँ घड़ी-दो-घड़ी

यह आग हमारा क्या कर लेगी

हम जो खाएँ रोज़ आग की फ़ीकी रोटी

जो अपने हाँड़ सेंकते जन्म बिताएँ

रात सवेरे पकने वालों को

आग भला क्या कहेगी?

हरभजन सिंह
About the poet

हरभजन सिंह

पंजाबी के सुप्रतिष्ठित कवि, आलोचक, अनुवादक और संस्कृति-समीक्षक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 18 Poems / Stories