वे मजबूर हैं अपनी खिसियाहट से।
अगर विचार की कोई मूर्ति बन पाती तो वे उसे तोड़ते।
गांधी को क्यों मारते?
क्यों तोड़ते वे बुद्ध की प्रतिमा को बामियान में,
अगर समता की कोई मूर्ति बन पाती तो।
या वे भगत सिंह को फाँसी पर क्यों चढ़ाते,
उस क्रांति को फाँसी पर न लटका देते
जिसका सपना उसकी आँखों में था?
वे क्यों तोड़ते मंदिरों को, मस्जिदों को?
उन्हें नहीं तोड़ना पड़ता अम्बेडकर की मूर्ति को
अगर संविधान की कोई मूर्ति बन पाती तो।
देवियो-सज्जनो, सदियों से झुँझलाए लोगों पर तरस खाओ।
जब उन्हें भूख लगेगी तब करेंगे बात।








