दुनिया का कोई क़ानून बद्दुआओं के लिए किसी को रोक नहीं सकता।
इसलिए आओ सब मिल कर बद्दुआ करें कि
इस व्यवस्था के पोषकों को कीड़े पड़ें।
आओ उनकी जड़ों में मट्ठा डालें।
जिस संसद, अदालत और प्रशासन को नहीं दीखते आँसू उन्हें आँसुओं में बहा दें।
हमारी अदालत उन सबको मुजरिम क़रार देती है।
उन सबका पुतला बना कर थूक दें उन पर।
या धरती पर उनके चित्र बनाकर रौंद डालें।
दुनिया का कोई क़ानून कुछ नहीं कर पाएगा।
भले हम बोल न पाएँ, लेकिन सपना तो देख ही सकते हैं।
दुनिया में कोई भी सपना देखने से नहीं रोक पाएगा।
इसलिए जो कुछ भी अच्छा है उसका मिल कर सपना देखें।
और सपना नींद में न देखें इस बात का ख़याल रहे।
दुनिया का कोई भी क़ानून खुली आँखों से सपना देखने से नहीं रोक पाएगा।
तो आओ मिलकर बद्दुआ करें उस व्यवस्था के लिए
जिसमें लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का कोई दोषी नहीं मिलता,
हत्यारे नहीं मिलते रोहित वेमुला के,
बलात्कारी नहीं मिलते मणिपुर के,
सोनी सोरी की योनि में ठूँस दिए गए थे पत्थर
उस व्यवस्था के लिए बद्दुआ करें।
हमने उन क़ानूनों को कभी नहीं तोड़ा जो हमारे दमन के काम आते हैं।
लेकिन आओ ग़ुस्से से देखे उन्हें।
दुनिया का कोई क़ानून ग़ुस्से से देखने से हमें रोक नहीं सकता।
मन ही मन बना डालते हैं एक देश किसी को पता भी नहीं चलेगा।
और मन में कोई देश बनाना क़ानून का उल्लंघन भी नहीं है।
मन ही मन दोषियों को सज़ा देना भी क़ानून का उल्लंघन नहीं है,
और अदालत को पता भी नहीं चलेगा कि उनके छोड़े हुओं को हमने सज़ा दे डाली है।
जिन्हें नहीं सुनाई देता चीत्कार उनके सामने रोने की ज़रूरत नहीं है।
बम हम फोड़ नहीं सकते क्योंकि क़ानून का उल्लंघन हम कर नहीं सकते,
पर हमारे वश में जो है, वह तो हम कर ही सकते हैं।








