हम देखते हैं केवल आज का प्रकाश
हम पाते हैं केवल आज की शीतल हवा
कल के सूर्य को, जिसने दिया हमें सुख
भुला दिया हमने, कल का मंद पवन भी
जब से निर्मित हुआ जगत, लेकर तब से
जितने विकार हुए प्रकृति में सारे—
यदि सोचा जाए, तो पावेंगे तत्व
हमारे भीतर, हमारे कलेजे में रहे हैं।
कल का मधुर फल भी मिलेगा तब
जब आज का फूल रहेगा आलम्ब बन।
सुगंधित सून भी लसता है उसी
कल की नम्र लतिका की टहनियों पर
क्या यह अपेक्षित नहीं है कि
स्मरें आज, कल की मदद को यथायोग्य?








