मासी - देवयानी

देवयानीदेवयानी13 Sept 1972

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बडी मासी से सबको डर लगता था
कोई भरोसा नही था उनके मिजाज़ का
घर की छोटी मोटी बातों में
सबसे अलग रखती थी राय

मासी अब नहीं रही
मासी की मौत जल कर हुई थी
कहते हैं उस वक्त घर में सब लोग छत पर सो रहे थे
सुबह चार बजे अकेले रसोई में क्या करने गई थी मासी
अगर पानी पीने के लिए उठी थी
तो चूल्हा जलाने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी
क्या सच में मौसा तुम्हें छत पर न पाकर रसोई में आए थे
क्या सच में उनके हाथ आग बुझाने की कोशिश में जले थे...

आज बहुत बरस गुज़र गए
तुम्हारी मौत को भी कई ज़माने हुए

अपनी साफगोई
अपने प्रतिवादों की
कीमत चुकाई तुमने
दुनिया के आगे रोए नहीं तुमने अपने दुख
पति की शराबखोरी और बेवफायी से लड़ती थी अपने अन्दर
और बाहर सबको लगता था
तुम उनसे झगड़ रही हो

तुमने जब देखा किसी स्त्री को उम्मीद से
हमेशा उसे पुत्रवती होने का दिया आशिर्वाद
तुम कहती थी
लड़कियाँ क्या इसलिए पैदा हों
ताकि उन्हें पैदा होने के दुख
उठाने पडें
इस तरह
देवयानी
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देवयानी

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