मेरी क़िस्मत में यही अच्छा रहा

चंद्रकांत देवतालेचंद्रकांत देवताले7 Nov 1936 – 14 Aug 2017

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मैं मरने से नहीं डरता हूँ

न बेवजह मरने की चाहत सँजोए रखता हूँ

एक जासूस अपनी तहक़ीक़ात बख़ूबी करे

यही उसकी नियामत है

किराए की दुनिया और उधार के समय की

कैंची से आज़ाद हूँ पूरी तरह

मुग्ध नहीं करना चाहता किसी को

मेरे आड़े नहीं आ सकती सस्ती और सतही मुस्कुराहटें

मैं वेश्याओं की इज़्ज़त कर सकता हूँ

पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख

भड़क उठता हूँ पिकासो के साँड़ की तरह

मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूँ

और ज़ख़्मों की भाषा और उनके गूँगेपन को

अच्छी तरह समझता हूँ

उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूँ

जिनमें भद्र लोग ज़िंदगी और कविता की नापजोख करते हैं

मेरी क़िस्मत में यही अच्छा रहा

कि आग और ग़ुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा

और मैंने उन लोगों पर यक़ीन कभी नहीं किया

जो घृणित युद्ध में शामिल हैं

और सुभाषितों से रौंद रहे हैं

अजन्मी और नन्ही ख़ुशियों को

मेरी यही कोशिश रही

पत्थरों की तरह हवा में टकराएँ मेरे शब्द

और बीमार की डूबती नब्ज़ को थामकर

ताज़ा पत्तियों की साँस बन जाएँ

मैं अच्छी तरह जानता हूँ

तीन बाँस चार आदमी और मुट्ठी भर आग

बहुत होगी अंतिम अभिषेक के लिए

इसीलिए न तो मैं मरने से डरता हूँ

न बेवजह शहीद होने का सपना देखता हूँ

ऐसे ज़िंदा रहने से नफ़रत है मुझे

जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्छा कहे

मैं हर किसी की तारीफ़ करते भटकता रहूँ

मेरे दुश्मन न हों

और इसे मैं अपने हक़ में बड़ी बात मानूँ।

चंद्रकांत देवताले
About the poet

चंद्रकांत देवताले

सातवें दशक के समादृत कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : चंद्रकांत देवताले जन्म : 07/11/1936 | बैतूल, मध्य प्रदेश निधन : 14/08/2017 | इंदौर, मध्य प्रदेश समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख कवि चंद्रकांत देवताले का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में 7 न…

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