आज लग रहा है संसार
खोखला
ख़ाली मुट्ठी की तरह
आज लगता है
चोर ले भागे हैं वह सब
जो था कल तक अपना
अब से फिर मुट्ठी भरने में
लग जाऊँगी
उन काँटे वाली चीज़ों से
जो पड़ी रह जाएँगी
यहीं
बिना डर
आज लग रहा है संसार
खोखला
ख़ाली मुट्ठी की तरह
आज लगता है
चोर ले भागे हैं वह सब
जो था कल तक अपना
अब से फिर मुट्ठी भरने में
लग जाऊँगी
उन काँटे वाली चीज़ों से
जो पड़ी रह जाएँगी
यहीं
बिना डर

सुपरिचित कवयित्री। मूल नाम : चंपा वैद जन्म : 13/09/1930 | पंजाब निधन : 23/07/2017
View profile & all 42 Poems / Stories