अपने ही बारे में बातें करती हूँ
दिए की लौ के बुझने का डर है
एक ही साँस में बहुत कुछ कह डालती हूँ
समय पर निगाह रखती
मैं अपने बचाव के लिए
भाषा के परों पर उड़ती
अपने भीतर के किसी कोने में छिप जाती हूँ
तनाव से बचने के लिए
हाथों के तोते उड़ाती हूँ
उनके रंगों को दूर-दूर तक उड़ता देखती
चली जाती हूँ
आहें भरती








