अंबर में देवी प्रकृति है
हमको दी दिखलाई
हुस्न मंडल में खड़ी खेलती
ख़ुशियाँ रौनक़ लाई।
दौड़ रही ने भर ली मुट्ठी
इसमें क्या-क्या आया
पर्वत, टीले, गहराई में
भरा मैदान सुहाया।
झरने, नाले, झीलें, नदियाँ
छोटे कई समंदर
ठंडी छाँह, मीठी वायु
वन बाग़ों से सुंदर।
बर्फ़, धूप, बरखा और बादल
ऋतुएँ, मेवे प्यारे
आसमान में भरे दृश्य हैं
उसी मुट्ठी में सारे।
सोहनी ने अंबर पर रुककर
धरती तक दिखलाकर
फिर मुट्ठी खोली और फेंका
सब कुछ ही फैलाकर।
ठीक यहीं धरती पर आकर
मुट्ठी गिनती सारी
उसी जगह कश्मीर बन गया
टुकड़ी जग से न्यारी।
है धरती, स्पर्श अंबर-सा,
सुंदरता में महके
धरती के रस स्वाद
नज़ारे, गूँज गगन में चहके।








