कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो - बशीर बद्र

Bashir Badrबशीर बद्र15 Feb 1935

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कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी का हवा न हो

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो

Bashir Badr
About the poet

Bashir Badr बशीर बद्र

Bashir Badr is an Indian poet of Urdu. Badr was born in Faizabad, India. He is an alumnus of Aligarh Muslim University. He is married and has three sons Nusrat Badr, Masum Badr, Taiyeb Badr and a daughter Saba Badr. He lived in the Aligarh university area dur…

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