ओ मज़दूर किसान, उठो

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

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उठो, उठो ओ नंगो भूखो

ओ मज़दूर किसान, उठो,

इस गतिमय मानव-समूह के

ओ प्रचंड अभिमान, उठो।

आज मुक्ति के अरमानों ने

मिलकर यों ललकारा है :

ओ सब सोनेवालो, जागो,

गूँज रहा नक्कारा है!

कैसी रात? कहाँ के सपने

यह नव प्रात पधारा है!

ऐसे हँसते-से प्रभात का

तुम करने सम्मान, उठो,

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

ले प्राणों के फूल करों में,

हिय में अमित उमंग भरे,—

कंधों पर ले विजय-पताका,

नयनों में रण-रंग भरे,—

नवल प्रात के स्वागत को तुम

चलो वीर निश्शंक, अरे;

क्या भय? क्या डर? आज झिझक क्या?

ओ मानस संतान उठो।

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

शतियों के आदर्श तुम्हारे

मूर्त रूप धर आये हैं;

नव समाज के नवल सृजन का

नया सँदेसा लाये हैं;

दिशि-दिशि में समता-स्थापन के

ये अभिनव स्वर छाये हैं;

महाक्रांति के नव विधान हित

तुम करने बलिदान उठो;

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

अब न आ सके रात भयंकर

ऐसा कुछ गति-चक्र चले;

फिर न अँधेरा छाये जग में

चाल न कोई वक्र चले;

चमके स्वतंत्रता का सूरज,

परवशता का अभ्र टले;

शोषण के शासन की इति हो,

तुम ऐसा प्रण ठान, उठो,

उठो, उठो ओ नंगो भूखो

ओ मज़दूर किसान, उठो।

सभी ओर तव भुज-बल-अंकित,

पृथिवी देखो, हल देखो,

निखिल विश्व के यंत्र-तंत्र में

तुम अपना कौशल देखो;

भू-मंडल के सिरजन में तुम

अपनी चहल-पहल देखो;

ज्योति जगाते, भीति भगाते,

ओ तुम शक्ति-निधान, उठो;

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

तुमने पीकर गरल, जगत को—

मधुरामृत का दान दिया;

शीतल हुआ जगत, जब तुमने

प्रलय-अग्नि का पान किया!

मरण-वरण कर तुमने सबको

नव जीवन, नव प्राण दिया;

बहुत पिया विष; अमृत पियो अब,

त्यागी वीर महान्, उठो;

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

सुलगा दो निज अंतर्जाला,

विकट लपट लंबी धधके,

होवे भस्म दासता, शोषण,

ऐसी यह होली भभके!

हो जाओ तुम मुक्त, कि विहँसें

ये सब तारागण नभ के

दुर्निवार तुम, सदा मुक्त, तुम,

करो विजय के गान, उठो;

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

किसका साहस है कि रख सके

तुमको यों चिर बंधन में?

स्वयं मुक्ति ही नाच रही है

सदा तुम्हारे स्पंदन में!

तुममें विप्लव अंतर्हित है,

जैसे ज्वाला चंदन में;

टेर रहा है तुम्हें विश्व यह

ओ जग के बलवान, उठो;

उठो, उठो ओ नंगो भूखो,

ओ मज़दूर किसान, उठो।

बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

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