आधी रात में रुलाई का पाठ

बद्री नारायणबद्री नारायण5 Oct 1965

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आधी रात में मैं करना चाहता हूँ

एक रुलाई का पाठ

जो एक शहर की सड़क पर

उसके संपूर्ण वैभव के ख़िलाफ़ रोई जा रही है।

हालाँकि यह मैं भली-भाँति जानता हूँ

कि अब तक जो भी हुए हैं रुलाई के स्मृतिकार

एक-एक कर मिटा दिए गए हैं

अगर नहीं बच गया है ग़लती से उनका कोई हर्फ़

तो उसे दूसरा अर्थ देने के लिए

नई पद्धतियाँ गढ़ ली गई हैं।

एक कवि ने कोशिश की थी,

रुलाई की विवेचना करने की

और ख़ुद भी रुलाई में तब्दील हो गया था

मेरा एक मित्र ने, जो वैज्ञानिक था, खोजना चाहा था

उसका अंतःतत्त्व

और ख़ुद भी उसके तत्त्व में बदल गया था

और यह तो मेरी आँखों के सामने ही घटित हुआ था

कि एक दार्शनिक ने दिया था रुलाई पर व्याख्यान

और ख़ुद रुलाई बन दुनिया में गूँजने लगा था,

उसने कहा था,

सृष्टि का आदि शब्द ‘ओम्’ नहीं ‘रुलाई’ है

जो स्वरों और व्यंजनों में फैलता रहता है

सब देखते रह गए थे और उसने सिद्ध कर दिया था :

कोई ज़रूरी नहीं कि हर रुलाई में आँसू आए,

आह निकले, ओह निकले, कोई ज़रूरी नहीं।

शुल्व सूत्र में एक वृत्तांत है कि

विंध्य के उस पार जो ढह गए हैं मूँगे के पहाड़

वे वस्तुतः एक गूँगे के रोने से ढहे हैं।

पुराणों में कहीं-कहीं उन हिरणियों की रुलाई का भी ज़िक्र है

जिनकी कृष्ण खाल पर यज्ञों में चलने की पवित्र प्रथा प्रचलित थी

सदियों पहले जब ध्रुवतारा पेशावर में उगता था

तो आकाश के केंद्र से अपने इस निष्कासन के

ख़िलाफ़ रोता था

पृथ्वी और आकाश में ऐसी जितनी गड़ी हैं रुलाइयाँ

मैं उन रुलाइयों का पाठ करना चाहता हूँ।

बद्री नारायण
About the poet

बद्री नारायण

सुपरिचित कवि-विचारक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बद्री नारायण जन्म : 05/10/1965

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