साइकिल को पता नहीं था
कि एक-एक कर तीलियाँ छोड़ती जा रही हैं उसका साथ
इसी को ‘जरा’ कहते हैं।
इसी को ‘बुढ़ापा’
इसी को ‘मृत्यु’ के क़रीब आना कहते हैं
धीरे-धीरे ज़ंग लग रहा था हैंडिल में,
चक्का हो रहा था जाम,
रह-रहकर लय टूट जाती थी
और सूखता जाता था चेन में पड़ा तेल।








