साइकिल

बद्री नारायणबद्री नारायण5 Oct 1965

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साइकिल को पता नहीं था

कि एक-एक कर तीलियाँ छोड़ती जा रही हैं उसका साथ

इसी को ‘जरा’ कहते हैं।

इसी को ‘बुढ़ापा’

इसी को ‘मृत्यु’ के क़रीब आना कहते हैं

धीरे-धीरे ज़ंग लग रहा था हैंडिल में,

चक्का हो रहा था जाम,

रह-रहकर लय टूट जाती थी

और सूखता जाता था चेन में पड़ा तेल।

बद्री नारायण
About the poet

बद्री नारायण

सुपरिचित कवि-विचारक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बद्री नारायण जन्म : 05/10/1965

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