संक्रमण

आयुष झाआयुष झा

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हर तरफ दुख-दर्द के तिलचट्टे पसरे हैं

अगर सौभाग्यवश कोई ख़ुशी कहीं दिखती भी है

तो वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते

वह भी संक्रमित हो जाती है।

पहुँचना ही संक्रमण है शायद!

मैं ब्रह्मांड की हर दृश्य-अदृश्य चीज़ को

हमेशा-हमेशा ख़ुश देखना चाहता था,

इसलिये मैं जहाँ कहीं भी पहुँचा

ख़ुद को बीच रास्ते ही पाया।

आयुष झा
About the poet

आयुष झा

नई पीढ़ी के कवि-लेखक।

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