चाहना और पाना

आसित आदित्यआसित आदित्य

1 min read · 12.4K reads

मैंने चाहा

कि ज़िंदगी हो

गर्मी की दोपहर नीरस

काटा जा सके जिसे

खेलते हुए लूडो या ताश

पर कम-बख़्त साँझ निकली

जब बढ़ाता है

दुकानदार दुकान

क्योंकि कल फिर आना है

तौलना है नफ़ा-नुक़सान

हिसाब बिठाना है

आसित आदित्य
About the poet

आसित आदित्य

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक।

View profile & all 40 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like