मैंने चाहा
कि ज़िंदगी हो
गर्मी की दोपहर नीरस
काटा जा सके जिसे
खेलते हुए लूडो या ताश
पर कम-बख़्त साँझ निकली
जब बढ़ाता है
दुकानदार दुकान
क्योंकि कल फिर आना है
तौलना है नफ़ा-नुक़सान
हिसाब बिठाना है
मैंने चाहा
कि ज़िंदगी हो
गर्मी की दोपहर नीरस
काटा जा सके जिसे
खेलते हुए लूडो या ताश
पर कम-बख़्त साँझ निकली
जब बढ़ाता है
दुकानदार दुकान
क्योंकि कल फिर आना है
तौलना है नफ़ा-नुक़सान
हिसाब बिठाना है

याद करोवो बचपन―
समय की पगडंडी परभागी जा रही है ज़िंदगी की खटारा दुपहिया
कई दिनों सेहम बार-बार खोलते रहे थे
स्मृतियाँ―दिल के जेब के सबसे अनमोल ख़ज़ाने हैं।
करती है आग्रहडपट भी देती है कभी-कभी—