मेघ बरस रहा है
कोई भी जगह न छोड़ी उसने
न कँचुकी उतारी
न खोला नीवी बन्ध
वह हर उस जगह है
जहाँ पहुँच सकते हैं अधर ।
कोई भी जगह न छोड़ी उसने
न कँचुकी उतारी
न खोला नीवी बन्ध
वह हर उस जगह है
जहाँ पहुँच सकते हैं अधर ।

शिक्षा : जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय(नई दिल्ली) से एम.फिल.,पी.एच.डी. ,विश्व-विद्यालय अनुदान आयोग की फेलोशिप के अंतर्गत मोहन राकेश और आचार्य महावीरप्रसाद द्दिवेदी पर शोध कार्य, क्या तो समय (कविता-संग्रह) 2004 भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली, कुछ आलोचनात्मक लेख, संस्कृति,उपनिवेश और हिंदी आलोचना बहुवचन-८, राष्ट्र की अवधारणा, भारत का अतीत और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,बहुवचन-11,उपनिवेश और हिंदी का स्वरूप,बहुवचन -२५ ,Mahatma Gandi international Hindi University,Verdha....... हिंदी नवरत्न.
जहाँ से टूटा था दाँतजीभ बार बार वहीं जाती सहलाती
दाएँ हाथ में बायाँ अदृश्य रहता थादायाँ ही जैसे हाथ हो
१)इतिहास में उन्होंने कभी मुझे मारा था
घरों में कहीं किसी जगह वह अपना घर बनाती हैंछत्ते जहाँ उनके अण्डे पलते हैं