वर्षा-रति - अरुण देव

अरुण देवअरुण देव16 Sept 1972

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मेघ बरस रहा है
कोई भी जगह न छोड़ी उसने
न कँचुकी उतारी
न खोला नीवी बन्ध
 
वह हर उस जगह है
जहाँ पहुँच सकते हैं अधर ।
अरुण देव
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अरुण देव

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