कुछ किताबें अँधेरे में चमकती हैं रास्ता देती हुईं
तो कुछ कड़ी धूप में कर देती हैं छाँह
कुछ एकांत की उदासी को भर देती हैं
दोस्ती की उजास से
तो कुछ जगा देती हैं खुली नींद से
जिसमें नहीं सुनाई पड़ता अपना ही रुदन
कुछ शोभा होती हैं ड्राइंग रूम की
हर कोई एक नज़र उन्हें देखता है
ऊपर ही ऊपर
पर मौन रह जाता है उनका अंतर्मन
कुछ नीरस होती हैं सूचनाओं सें भरी हुईं
जो न हँसती हैं न मुस्काती हैं
बस यों ही खड़ी रहती हैं चुपचाप
हँसती हुई किताबों का लेखक
ज़रूरी नहीं है कि हमेशा खिलखिलाता हो
अक्सर गंभीर लोगों ने गहरे व्यंग्य किए हैं
ऐसी किताबें पकड़ लेती हैं बीच रास्ते में ही
और मुश्किल से गला छोड़ती हैं
ग़मगीन कर देने वाली किताबों का तो अजब हाल है
उसके पाठक तो बस उसी की तलाश में रहते हैं
डूब जाते हैं दु:ख की नदी में
जैसे वह उनकी ही आँख का पानी हो
कुछ तो इतनी सजी-सँवरी होती हैं कि बस ललचा जाता है जी
पर पुस्तक पकी आँखों से जब गुज़रना होता है
शर्मिंदा होकर छुपा लेती हैं अपने पन्ने
कुछ किताबें गुज़ार देती हैं अपनी ज़िंदगी
कुतुबख़ाने के किसी अँधेरे में
उन तक पहुँचता है कभी-कभी कोई अन्वेषी
थक-हार कर खोजते हुए उसी को जैसे
कुछ की कलई एक बार पढ़ते ही उतर जाती है
कुछ को बार-बार पढ़ो तो भी छूट जाता है बहुत कुछ
कुछ किताबें काल को जीत लेती हैं
जन्म लेती रहती हैं उनसे नई किताबें
कुछ किताबें अकाल होती हैं
कब गईं पता भी नहीं चलता
कुछ विनम्रता से खुलती हैं और देर तक पढ़ी जाती हैं
कुछ घमंड़ से ऐंठी रहती हैं
कि घुटने लगता है दम
किताबों में कुछ लोग भर देते हैं ज़हर
काले पड़ जाते हैं उनके पन्ने
डरावनी हो जाती है अक्षरों की शक्ल
ऐसी किताबें चाहती हैं बंद रहना
कुछ किताबों में आ बैठती हैं तितलियाँ
परागकण की तरह महकते अक्षरों पर
पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते उड़ जाती है सुगंध
पन्नों में दबी मिलती हैं वही तितलियाँ
वे किताबें बहुत बदनसीब होती हैं
जिन्हें लोग बस रट लेते हैं
किताबें नहीं चाहतीं कि उन्हें माना जाए अंतिम सत्य
अपने हाशिए पर लिखी टिप्पणियाँ उन्हें अच्छी लगती हैं
वे नहीं चाहती बस अगला संस्करण
वे तो चाहती हैं संवर्धित, संशोधित संस्करण








