कविता नहीं है यह - अनिल जनविजय

अनिल जनविजयअनिल जनविजय28 Sept 1957

4 min read · 12.3K reads

इतिहास पटल पर दमक रहे हैं
एक के बाद एक सैकड़ों प्रहसन
जिनके दरम्यान
ऊटपटाँग हास्य चल रहा है विमर्श के रँग में
 
उन्हें देखते-सुनते ग़ायब हो गई है
हँसने और रोने के बीच की विभाजक रेखा

एक विदूषक छड़ी के सिरे पर
अपनी टोपी नचा रहा है
एक और विदूषक चल रहा है हाथों के बल
एक विदूषक रो रहा है आँखों से गँगा-जमुना बहाते हुए

एक विदूषक दूसरे विदूषक से लगातार मार खा रहा है
एक विदूषक दूसरे विदूषक को लगातार शब्दों से पीट रहा है

नेपथ्य में गूँज रही एक नक़ली रिकॉर्ड की गई हँसी
जिसे सुन कर लोग मुँह में उंगली डाल
खिलखिलाने की मुद्रा में हैं
भूलते हुए
कि हर प्रहसन के पीछे छिपी हैं न जाने कितनी शोकाँतिकाएँ
एक विशालकाय मशीन के कलपुर्ज़ों की खड़खड़ाहट
सुनाई देती है उनकी हँसी में।
अनिल जनविजय
About the poet

अनिल जनविजय

View profile & all 70 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like