सोचता था

अमन त्रिपाठीअमन त्रिपाठी2 Dec 1997

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ऐसा सोचता था,

कभी मियाँ नज़ीर या मीर तक़ी मीर की तरह

अनुपम मिश्र की तरह कोई बात कहके

जिसको जब चाहूँगा बुला लूँगा

सोचता था कि विशेष कठिनाइयाँ उठा लेने से

विशिष्टता आसानी से मिल जाती है

राजनीतिक मैं उतना ही होना चाहता था

जितना कम इस देश में लोकतंत्र है

पर पिछले समयों में चीज़ें बहुत तेज़ी से बदली हैं

शहर में पिछली शताब्दी की सबसे कड़ी ठंड पड़ रही है

और वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़ सबसे कड़े प्रदर्शन हो रहे हैं—

और मैं तेज़ी से होने वाले बदलावों का प्रतिपक्ष बनने की कोशिश के बीच

दूर बैठकर ठंड से मरने वालों के आँकड़े नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ

और विरोध-प्रदर्शनों में लोगों की कम होती संख्या गिन रहा हूँ

शहर से दूर, प्रेमिका की गली में तो कोई बदलाव नहीं

लेकिन मुझे, उसकी गली

और अपने घर जाती सड़क के पथरीलेपन में

अंतर लगना बंद हो गया है

बल्कि उसकी गलियाँ मुझे बाक़ी सब गलियों की तरह लगने लगी हैं

प्रेम का इतिहासबोध हालाँकि मुझे हिक़ारत से देखता है

क्योंकि मैं इसकी विपरीत बात

मानने को तैयार नहीं

प्रेमिका में कोई ख़ास बात नहीं

वही नाज़-ओ-अंदाज़, वही नुक़्ताचीं है ग़म-ए-दिल

जिसको सुनाए न बने

वही ऐतिहासिक क्लासिक ऊहापोह

लेकिन फिर वही ट्रैजेडी कि वह मुझे लगने लगती है

बाक़ी लड़कियों की तरह

पर यहाँ भी इसकी उल्टी बात लागू नहीं होती

ऐसे परिवर्तनों के बीच मैं हर तफ़्सील

की स्मृति दर्ज कर लेना चाहता हूँ

पुरानेपन को हसरत से देखता हुआ

और परिवर्तन को किंचित सहम कर

हालाँकि तत्काल होने वाले परिवर्तनों से भी मुझे गुरेज़ नहीं

मसलन,

शहर में यमुना से गुज़रते हुए,

‘यमुना नहीं यह नाली है

नदी के नाम पे गाली है’

जैसा नारा ज़बान पर आना तत्काल बंद हो जाना चाहिए

एक शहर में होते विरोध-प्रदर्शन

तत्काल सारे शहरों में दिखने लगने चाहिए

मुझे तत्काल प्रेमिका के चौखट पर सर पटक कर जान दे देनी चाहिए

ऐसे परिवर्तन तत्काल हो जाने चाहिए

पर अफ़सोस,

तमाम दुनिया के हरामख़ोर अचानक से

चेतना और अध्यात्म के,

दर्शन के उच्च स्तर पर जीने लगे हैं

जिनके पास हर ऊँच-नीच का जवाब

उनकी उच्च से उच्चतर होती चेतना है

मेरी चेतना पर से प्रेमिका की स्थानीयता गुज़रती है

मैं बस उसकी मातृभाषा सीखना चाहता था

ताकि उसके दुखों को उसकी मातृभाषा में सुन सकूँ

लेकिन उसकी स्थानीयता के भार से दबकर

चूर होता हुआ मैं

उसकी मातृभाषा का एक मुहावरा बन जाता हूँ

एक बहुत राजनैतिक और भदेस मुहावरा,

जिससे कोई काम नहीं लिया जा सकता

कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

अमन त्रिपाठी
About the poet

अमन त्रिपाठी

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक। मूल नाम : अमन त्रिपाठी जन्म : 02/12/1997 | देवरिया, उत्तर प्रदेश

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