श्वास पर आयु के पहरे

अजीत रायज़ादाअजीत रायज़ादा17 Aug 1947

1 min read · 12.4K reads

भ्रमर बनकर प्रातः तुमने

चूम लिया कलियों को

मेघ होकर चंद्रिका से

की ठिठोली रात को

और तुम्हीं अब अश्रु बन कपोल पर ठहरे!

ली समाधि फिर बन हिमगिरि

धवल वस्त्र धारण कर

हो तुम मौनव्रती अंबर या

कोलाहल करते निर्झर,

जग की देख व्यथा बने आलोड़ित सागर गहरे!

तुम मोहन हो या सम्मोहन

मैं न बूझा खेल तनिक,

रोऊँ या हँस दूँ जीवन पर

जग चिरतंतन सत्य? क्षणिक?

किसे मिला अमरत्व, श्वास पर आयु के पहरे!

अजीत रायज़ादा
About the poet

अजीत रायज़ादा

सुपरिचित कवि-लेखक और प्रशासनिक अधिकारी। एक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। 'हाशिए पर आदमी' उल्लेखनीय कविता-संग्रह। मूल नाम : अजीत रायज़ादा जन्म : 17/08/1947 | सीतापुर, उत्तर प्रदेश अजीत रायज़ादा का जन्म 17 सितंबर 1947 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ। उन्होंने स…

View profile & all 30 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like