भ्रमर बनकर प्रातः तुमने
चूम लिया कलियों को
मेघ होकर चंद्रिका से
की ठिठोली रात को
और तुम्हीं अब अश्रु बन कपोल पर ठहरे!
ली समाधि फिर बन हिमगिरि
धवल वस्त्र धारण कर
हो तुम मौनव्रती अंबर या
कोलाहल करते निर्झर,
जग की देख व्यथा बने आलोड़ित सागर गहरे!
तुम मोहन हो या सम्मोहन
मैं न बूझा खेल तनिक,
रोऊँ या हँस दूँ जीवन पर
जग चिरतंतन सत्य? क्षणिक?
किसे मिला अमरत्व, श्वास पर आयु के पहरे!








