मैं इस पल के छोर पर

उस्मान ख़ानउस्मान ख़ान12 Jul 1984

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मैं इस पल के छोर पर

सभ्यताओं का टूटना देखता हूँ

देखता हूँ

उद्दाम लहरें टकरा रही हैं

अत्याधुनिक

नव से नवतर साम्राज्यों के

प्रतीकों, चिह्नों, स्थापनाओं से

ग़ुलाम हिसाब साफ़ कर रहे हैं आक़ाओं से

भूत-भविष्य-वर्तमान इस वेला में कुछ नहीं

भूल-भुलैया में हर संज्ञा

नए बंधन में बँधते संबंध सारे

उँच-नीच, आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ के

शाम होती है आज़ाद सदियों में कभी

जैसे इस पल, अभी…

मैं इस पल के छोर पर

जहाँ तथाकथित जीवन का गणित

गड़बड़ा जाता है

जहाँ लाखों मृत और घायल

अपनी स्वप्न-पूर्ति चाहते हैं

जीवितों से तुरंत, इसी पल

सेहत-स्फूर्ति चाहते हैं

अपने काले अँधेरे में गिरता हूँ

फिर उजाले की तरह उठने के लिए

नव से नवतर होता विद्रोह

मुझे सिखाता बेहतर से बेहतर

सम्राटों के मुकुटों पर

चिंगारियाँ उचटती

शंकित-भयभीत अपने पूर्वजों को पुकारते

वे दुःस्वप्नग्रस्त

अपनी ही ख़ूँख़ारी से त्रस्त

उच्च-स्नायविक दौरे में

करते अपने अचूक मंत्रों का जाप

अपना ही नाम चिल्लाते दाँत पीस-पीस

फ़ाशीवादी प्रलाप

मैं ख़ुश मगर इस शाम

देखता हूँ महासंग्राम

संक्रांति…

उस्मान ख़ान
About the poet

उस्मान ख़ान

नई पीढ़ी के कवि-आलोचक। मूल नाम : उस्मान ख़ान जन्म : 12/07/1984 | मंदसौर, मध्य प्रदेश उस्मान ख़ान नई पीढ़ी के कवि-आलोचक हैं जो अपनी रचनात्मकता के साथ संयम से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मालवा के लोक–साहित्य पर पी.एच.डी. किया है और फ़ि…

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