ऋतुस्नानोपरांत गीले हैं केश वसुमती के
पैरों की एड़ियाँ अरुणाभ
आश्विन की हवा में शीत कम है, दाह है दारुण
अंतिम ये दिन इस मास का
प्रहर-प्रहर बीते जैसे बीतते हैं युग
महालया की भोर में भी मंत्र संग जागी कोरी ये देह
कोरी रही लाल साड़ी की पाढ़
आज ये शरद की पूर्णिमा की रात्रि
मत आओ लक्ष्मी मेरे द्वार, मत पूछो कौन जागता है आज
आग-लगी, अभागी इन आँखों को
भाता नहीं सुनो चंद्रमा तुम्हारा रंग-राग








