लाई पैग़ाम मौजे-बादे-बहार

Tilok Chand MehroomTilok Chand Mehroom1 Jul 1887 – 6 Jan 1966

2 min read · 12.8K reads

लाई पैग़ाम मौजे-बादे-बहार
कि हुई ख़त्‍म शोरिशे - कश्‍मीर
दिल हुए शाद अम्‍न केशों के
है यह गांधी के ख़्वाब की ताबीर
सुलहजोई में अम्‍नकोशी में
काश होती न इस क़दर ताख़ीर
ताकि होता न इस इस क़दर नुक़्साँ
और होती न दहर में तश्‍हीर
बच गये होते नौजवां कितने
जिनको मरवा दिया बसर्फे-कसीर
ज़िक्र क्‍या उसका, जो हुआ सो हुआ
उन बेचारों की थी यही तक़दीर
काम लें अब ज़रा तहम्‍मुल से
दोनों मुल्‍कों के साहबे-तदबीर
दिल से तख़रीब का ख़याल हो दूर
और हो जायें माइले-तामीर
रंग इस में ख़ुलूस का भर दें
खिंच रही है जो अम्‍न की तस्‍वीर
अहदो-पैमां हों वक़्फे-इस्‍तक़लाल
उनकी तकमील में नहीं तक़्सीर
अहले-अख़बार हों वफ़ा आमोज़
क़ातए-दोस्‍ती न हो तहरीर
आमतुन्‍नास हों इधर न उधर
किसी उन्‍वान इश्तिआल पज़ीर
अलमे-आश्‍ती बलन्‍द रहे
अन्‍दरूने-नियाम हो शमशीर
हर दो जानिब की बेटियाँ-बहनें
हैं जो मज़बूरे-क़ैदे-बेज़ंजीर
जिस क़दर जल्‍द हो रिहा हो जाएँ
उनका क्‍या जुर्म ? क्‍यों रहें वह असीर
है तक़ाज़ा यही शराफ़त का
दोनों मुल्‍क़ों की इसमें हैं तौक़ीर
रहें आबाद हिन्‍दो-पाकिस्‍ताँ
तेरी रहमत से अय ख़ुदाए-क़दीर
ग़रज परवाज़ हो चुका महरूम
अब कहें कुछ ‘हफ़ीज़’ और ‘तासीर’

Tilok Chand Mehroom
About the poet

Tilok Chand Mehroom

Tilok Chand Mehroom (1 July 1887 – 6 January 1966) was an Indian Urdu poet who was admired not only for his writings but also for his simple lifestyle and evident deep dislike of religious discrimination. Poetry There were no libraries in the schools of North…

View profile & all 6 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like