About साइमा इसमा
मूल नाम : साइमा इसमा
Selected Quotes
Poetry & Stories
मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती
मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहतीमोहब्बत में तो पेश-ओ-पस की गुंजाइश नहीं रहती
ख़ाली हाथों में मोहब्बत बाँटती रह जाऊँगी
ख़ाली हाथों में मोहब्बत बाँटती रह जाऊँगीअपने ख़ाली हाथ आख़िर देखती रह जाऊँगी
उस रस्ते पर जाते देखा कोई नहीं है
उस रस्ते पर जाते देखा कोई नहीं हैघर है इक और उस में रहता कोई नहीं है
कुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने में
कुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने मेंमैं तो सारी बिखर गई हूँ घर को इकट्ठा रखने में
सुनते रहते हैं फ़क़त कुछ वो नहीं कह सकते
सुनते रहते हैं फ़क़त कुछ वो नहीं कह सकतेआइनों से जो कहें उन को नहीं कह सकते
About साइमा इसमा
मूल नाम : साइमा इसमा
साइमा इसमा: Quick Answers
Who is साइमा इसमा?
मूल नाम : साइमा इसमा
Where can I read साइमा इसमा's poetry?
Kavishala has 27 poems and stories by साइमा इसमा, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by साइमा इसमा
मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती
मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहतीमोहब्बत में तो पेश-ओ-पस की गुंजाइश नहीं रहती
ख़ाली हाथों में मोहब्बत बाँटती रह जाऊँगी
ख़ाली हाथों में मोहब्बत बाँटती रह जाऊँगीअपने ख़ाली हाथ आख़िर देखती रह जाऊँगी
उस रस्ते पर जाते देखा कोई नहीं है
उस रस्ते पर जाते देखा कोई नहीं हैघर है इक और उस में रहता कोई नहीं है
कुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने में
कुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने मेंमैं तो सारी बिखर गई हूँ घर को इकट्ठा रखने में
सुनते रहते हैं फ़क़त कुछ वो नहीं कह सकते
सुनते रहते हैं फ़क़त कुछ वो नहीं कह सकतेआइनों से जो कहें उन को नहीं कह सकते
हँसी की आँख में फैला नमी का रंग देखा है
हँसी की आँख में फैला नमी का रंग देखा हैअँधेरों में लिपटता रौशनी का रंग देखा है
नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआ
नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआजा के तब कोई मसीहाई पे मजबूर हुआ
कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था
कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता थाकब से कोई किसी दीवार में दर चाहता था
सर-ए-ख़याल मैं जब भूल भी गई कि मैं हूँ
सर-ए-ख़याल मैं जब भूल भी गई कि मैं हूँअचानक एक अजब बात ये सुनी कि मैं हूँ
हम पस-ए-पर्दा रहें या पेश-ए-मंज़र में रहें
हम पस-ए-पर्दा रहें या पेश-ए-मंज़र में रहेंहाँ हमारे हर्फ़ रौशन दीदा-ए-तर में रहें
कभी बरसों का सिमटाव बहुत अच्छा लगा है
कभी बरसों का सिमटाव बहुत अच्छा लगा हैकभी लम्हे का फैलाव बहुत अच्छा लगा है
साइमा इसमा के शेर
न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखाहुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँ
Selected Quotes by साइमा इसमा (चुनिंदा उद्धरण)
न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखाहुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँमयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहतीमोहब्बत में तो पेश-ओ-पस की गुंजाइश नहीं रहतीहँसी की आँख में फैला नमी का रंग देखा हैअँधेरों में लिपटता रौशनी का रंग देखा हैहम पस-ए-पर्दा रहें या पेश-ए-मंज़र में रहेंहाँ हमारे हर्फ़ रौशन दीदा-ए-तर में रहेंख़ाली हाथों में मोहब्बत बाँटती रह जाऊँगीअपने ख़ाली हाथ आख़िर देखती रह जाऊँगीकुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने मेंमैं तो सारी बिखर गई हूँ घर को इकट्ठा रखने मेंVideos on साइमा इसमा
Loading videos…
Books by साइमा इसमा
Loading books…








