दर्द का सिलसिला

Ramesh PokhriyalRamesh Pokhriyal15 Jul 1959

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जिंदगी की श्वास में
मंजिलों की आस में
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

प्यार की एक बूँद को
हर पल तरसते
किंतु बदले में मिले
पत्थर बरसते
कुछ ना पूछो जिंदगी से, गम सहित क्या-क्या मिला है
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

इस छोर से उस छोर तक
सभी को परखते रहे,
किंतु पग-पग में मिला छल
जिसके सभी गम भी सहे
कौन जाने कब ढहेगा, घोर दुख का ये किला है,
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

आस की नन्ही किरण
झेलती तम को रही,
कभी तो तूफान कभी
बयार विष की भी बही
सफल कैसे हो सफर यह, जिंदगी का जो मिला है,
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

Ramesh Pokhriyal
About the poet

Ramesh Pokhriyal

Ramesh Pokhriyal (born 15 July 1959),known by his nom de plume Nishank is an Indian politician serving as the Minister of Human Resource Development in the Second Modi ministry. He represents the Haridwar Parliamentary constituency of Uttarakhand in the 17th…

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