पांव की नस

Rajesh JoshiRajesh Joshi18 Jul 1946

2 min read · 12.9K reads

पांव की नस
पांव की कोई नस अचानक चढ़ जाती है
इतना तेज दर्द कि पांव की मामूली सी जुम्बिश भी
इस नामुराद को बर्दाश्त नहीं

सोचता हूं और भी तो तमाम नसें हैं शरीर में
सलीके से जो रही आती हैं हमेशा अपनी अपनी जगह
एक यही कमज़र्फ़ क्यों वक्त बेवक्त ऐंठ कर
मेरा सुख चैन छीन लेती है

पैरों के साथ बरती गई न जाने कौन-सी लापरवाही का
बदला ले रही थी वह नस
मुझे लगा अपनी अकड़ती आवाज़ में कह रही हो जैसे
कि दिनभर बेरहम जल्लादों की तरह थकाया तुमने पैरों को
और बदले में क्या दिया?
दिनभर हम्मालों की तरह भार ढोया पैरों ने तुम्हारे शरीर का
कितनी सड़कें नापीं,
खाक झानी कितनी आड़ी टेढ़ी गलियों की
कितनी भटकनों की स्मृतियां दर्ज इनके खाते में

इन्होंने जहां चाहा वहां पहुंचाया तुमको
घंटों जूतों में कैद रखा तुमने इन्हें
थकान से चूर तुम तो सोते समय भी
पैरों को ठंडे पानी से धोना भूल गये
और पड़ गये बिस्तर पर

खींच कर अपना हाथ उंगलियों से टोता हूं नस को
धीरे धीरे सहलाता हूं, दबाता हूं
जातियों के जन्म की कोई मनुवादी धारणा
कौंधती है दिमाग में
इतनी पीड़ा कि फूट पड़ती है हंसी और कराह एक साथ
ओह! पिण्डली की एक नस ने हिला कर रख दिया है
मेरे पूरे वजूद को
कितना असमर्थ कर दिया है इसने
पांव को उतार कर ज़मीन पर टिकाना भी नामुमकिन
कमबख़्त एक नस ने जरा सा ऐंठकर
हर मुमकिन को कर दिया
नामुमकिन!

Rajesh Joshi
About the poet

Rajesh Joshi

Rajesh Joshi (b. 18 July 1946) is a Hindi writer, poet, journalist and a playwright, who was the recipient of 2002 Sahitya Akademi Award in Hindi for his anthology of poems - 'Do Panktiyon Ke Beech' (Between Two Lines), given by Sahitya Akademi, India's Natio…

View profile & all 25 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like