मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ

मुनव्वर रानामुनव्वर राना26 Sept 1952 – 14 Jan 2024

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मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ

मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ

ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है

अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ

मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे

मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ

मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा

मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ

बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में

अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ

मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में

मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ

बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना

सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ

मुनव्वर राना
About the poet

मुनव्वर राना

मुनव्वर राना (जन्म: 26 नवंबर 1952,मृत्यु: 14 जनवरी 2024, रायबरेली, उत्तर प्रदेश) उर्दू भाषा के साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक कविता शाहदाबा के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[1] वे लखनऊ में रहते हैं। भारत-पाकिस्तान…

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